दुआ का टूटा हुआ हर्फ़ सर्द आह में है
(कवि : परवीन शाकिर)
दुआ का टूटा हुआ हर्फ़ सर्द आह में है
तिरी जुदाई का मंज़र अभी निगाह में है
तिरे बदलने के बा-वस्फ़ तुझ को चाहा है
ये ए'तिराफ़ भी शामिल मिरे गुनाह में है
अज़ाब देगा तो फिर मुझ को ख़्वाब भी देगा
मैं मुतमइन हूँ मिरा दिल तिरी पनाह में है
बिखर चुका है मगर मुस्कुरा के मिलता है
वो रख रखाव अभी मेरे कज-कुलाह में है
जिसे बहार के मेहमान ख़ाली छोड़ गए
वो इक मकान अभी तक मकीं की चाह में है
यही वो दिन थे जब इक दूसरे को पाया था
हमारी साल-गिरह ठीक अब के माह में है
मैं बच भी जाऊँ तो तन्हाई मार डालेगी
मिरे क़बीले का हर फ़र्द क़त्ल-गाह में है
तिरी जुदाई का मंज़र अभी निगाह में है
तिरे बदलने के बा-वस्फ़ तुझ को चाहा है
ये ए'तिराफ़ भी शामिल मिरे गुनाह में है
अज़ाब देगा तो फिर मुझ को ख़्वाब भी देगा
मैं मुतमइन हूँ मिरा दिल तिरी पनाह में है
बिखर चुका है मगर मुस्कुरा के मिलता है
वो रख रखाव अभी मेरे कज-कुलाह में है
जिसे बहार के मेहमान ख़ाली छोड़ गए
वो इक मकान अभी तक मकीं की चाह में है
यही वो दिन थे जब इक दूसरे को पाया था
हमारी साल-गिरह ठीक अब के माह में है
मैं बच भी जाऊँ तो तन्हाई मार डालेगी
मिरे क़बीले का हर फ़र्द क़त्ल-गाह में है
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ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल
हवा बिखेर गई मोम-बत्तियाँ और फूल
वो लोग आज ख़ुद इक दास्ताँ का हिस्सा हैं
जिन्हें अज़ीज़ थे क़िस्से कहानियाँ और फूल
ये सब तिरे मिरे इज़हार की अलामत हैं
शफ़क़ के रंग में शोला, लहू, ज़बाँ और फूल
यक़ीन कर कि यही है बुझे दिलों का इलाज
तिरी वफ़ा तिरी चाहत तिरा गुमाँ और फूल
'ज़फ़र' मैं सूरत-ए-ख़ुश्बू क़याम करता हूँ
सो एक से मुझे लगते हैं सब मकाँ और फूल
हवा बिखेर गई मोम-बत्तियाँ और फूल
वो लोग आज ख़ुद इक दास्ताँ का हिस्सा हैं
जिन्हें अज़ीज़ थे क़िस्से कहानियाँ और फूल
ये सब तिरे मिरे इज़हार की अलामत हैं
शफ़क़ के रंग में शोला, लहू, ज़बाँ और फूल
यक़ीन कर कि यही है बुझे दिलों का इलाज
तिरी वफ़ा तिरी चाहत तिरा गुमाँ और फूल
'ज़फ़र' मैं सूरत-ए-ख़ुश्बू क़याम करता हूँ
सो एक से मुझे लगते हैं सब मकाँ और फूल
दुआ का टूटा हुआ हर्फ़ सर्द आह में है दुआ का टूटा हुआ हर्फ़ सर्द आह में है
तिरी जुदाई का मंज़र अभी निगाह में है
तिरे बदलने के बा-वस्फ़ तुझ को चाहा है
ये ए'तिराफ़ भी शामिल मिरे गुनाह में है
अज़ाब देगा तो फिर मुझ को ख़्वाब भी देगा
मैं मुतमइन हूँ मिरा दिल तिरी पनाह में है
बिखर चुका है मगर मुस्कुरा के मिलता है
वो रख रखाव अभी मेरे कज-कुलाह में है
जिसे बहार के मेहमान ख़ाली छोड़ गए
वो इक मकान अभी तक मकीं की चाह में है
यही वो दिन थे जब इक दूसरे को पाया था
हमारी साल-गिरह ठीक अब के माह में है
मैं बच भी जाऊँ तो तन्हाई मार डालेगी
मिरे क़बीले का हर फ़र्द क़त्ल-गाह में है
तिरी जुदाई का मंज़र अभी निगाह में है
तिरे बदलने के बा-वस्फ़ तुझ को चाहा है
ये ए'तिराफ़ भी शामिल मिरे गुनाह में है
अज़ाब देगा तो फिर मुझ को ख़्वाब भी देगा
मैं मुतमइन हूँ मिरा दिल तिरी पनाह में है
बिखर चुका है मगर मुस्कुरा के मिलता है
वो रख रखाव अभी मेरे कज-कुलाह में है
जिसे बहार के मेहमान ख़ाली छोड़ गए
वो इक मकान अभी तक मकीं की चाह में है
यही वो दिन थे जब इक दूसरे को पाया था
हमारी साल-गिरह ठीक अब के माह में है
मैं बच भी जाऊँ तो तन्हाई मार डालेगी
मिरे क़बीले का हर फ़र्द क़त्ल-गाह में है