गुज़रे जो अपने यारों की सोहबत में चार दिन
(कवि : ए जी जोश)
गुज़रे जो अपने यारों की सोहबत में चार दिन
ऐसा लगा बसर हुए जन्नत में चार दिन
उम्र-ए-ख़िज़र की उस को तमन्ना कभी न हो
इंसान जी सके जो मोहब्बत में चार दिन
जब तक जिए निभाएँगे हम उन से दोस्ती
अपने रहे जो दोस्त मुसीबत में चार दिन
ऐ जान-ए-आरज़ू वो क़यामत से कम न थे
काटे तिरे बग़ैर जो ग़ुर्बत में चार दिन
फिर उम्र भर कभी न सुकूँ पा सका ये दिल
कटने थे जो भी कट गए राहत में चार दिन
जो फ़क़्र में सुरूर है शाही में वो कहाँ
हम भी रहे हैं नश्शा-ए-दौलत में चार दिन
उस आग ने जला के ये दिल राख कर दिया
उठते थे 'जोश' शोले जो वहशत में चार दिन
ऐसा लगा बसर हुए जन्नत में चार दिन
उम्र-ए-ख़िज़र की उस को तमन्ना कभी न हो
इंसान जी सके जो मोहब्बत में चार दिन
जब तक जिए निभाएँगे हम उन से दोस्ती
अपने रहे जो दोस्त मुसीबत में चार दिन
ऐ जान-ए-आरज़ू वो क़यामत से कम न थे
काटे तिरे बग़ैर जो ग़ुर्बत में चार दिन
फिर उम्र भर कभी न सुकूँ पा सका ये दिल
कटने थे जो भी कट गए राहत में चार दिन
जो फ़क़्र में सुरूर है शाही में वो कहाँ
हम भी रहे हैं नश्शा-ए-दौलत में चार दिन
उस आग ने जला के ये दिल राख कर दिया
उठते थे 'जोश' शोले जो वहशत में चार दिन
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मौत भी मेरी दस्तरस में नहीं मौत भी मेरी दस्तरस में नहीं
और जीना भी अपने बस में नहीं
आग भड़के तो किस तरह भड़के
इक शरर भी तो ख़ार-ओ-ख़स में नहीं
क़त्ल-ओ-ग़ारत खुली फ़ज़ा का नसीब
ऐसा ख़तरा कोई क़फ़स में नहीं
क्या सुने कोई दास्तान-ए-वफ़ा
फ़र्क़ अब इश्क़ और हवस में नहीं
ज़ुल्म के सामने हो सीना-सिपर
हौसला इतना हम-नफ़स में नहीं
'जोश' वो जो कहें करो तस्लीम
फ़ाएदा कुछ भी पेश-ओ-पस में नहीं
और जीना भी अपने बस में नहीं
आग भड़के तो किस तरह भड़के
इक शरर भी तो ख़ार-ओ-ख़स में नहीं
क़त्ल-ओ-ग़ारत खुली फ़ज़ा का नसीब
ऐसा ख़तरा कोई क़फ़स में नहीं
क्या सुने कोई दास्तान-ए-वफ़ा
फ़र्क़ अब इश्क़ और हवस में नहीं
ज़ुल्म के सामने हो सीना-सिपर
हौसला इतना हम-नफ़स में नहीं
'जोश' वो जो कहें करो तस्लीम
फ़ाएदा कुछ भी पेश-ओ-पस में नहीं
कोई शिकवा तो ज़ेर-ए-लब होगा कोई शिकवा तो ज़ेर-ए-लब होगा
कुछ ख़मोशी का भी सबब होगा
मैं भी हूँ बज़्म में रक़ीब भी है
आख़िरी फ़ैसला तो अब होगा
आएँ मय-ख़ाने में कभी वाइ'ज़
हूर भी होगी और सब होगा
बोल ऐ मेरे दिल की तारीकी
तेरा सूरज तुलूअ' कब होगा
सुनता होगा सदाएँ उस दिल की
शाम-ए-तन्हाई में वो जब होगा
कब छटेंगी ये बदलियाँ ग़म की
साफ़ मतला ये 'जोश' कब होगा
कुछ ख़मोशी का भी सबब होगा
मैं भी हूँ बज़्म में रक़ीब भी है
आख़िरी फ़ैसला तो अब होगा
आएँ मय-ख़ाने में कभी वाइ'ज़
हूर भी होगी और सब होगा
बोल ऐ मेरे दिल की तारीकी
तेरा सूरज तुलूअ' कब होगा
सुनता होगा सदाएँ उस दिल की
शाम-ए-तन्हाई में वो जब होगा
कब छटेंगी ये बदलियाँ ग़म की
साफ़ मतला ये 'जोश' कब होगा
मुमकिन है शब-ए-हिज्र दुआ का न असर हो मुमकिन है शब-ए-हिज्र दुआ का न असर हो
है रात वो क्या रात कि जिस की न सहर हो
ठुकरा के चले जाना है बर-हक़ तुम्हें लेकिन
बस रखना ख़याल इतना जहाँ को न ख़बर हो
वो शब जो सितारों से भरी हो तो हमें क्या
पहलू में अगर तेरे मिरी शब न बसर हो
गरजा है बड़े ज़ोर से बादल ज़रा देखो
बिजली से गिरी जिस पे कहीं मेरा न घर हो
जीवन है सफ़र 'जोश' ये तस्लीम है लेकिन
महबूब का हो साथ तो क्या ख़ूब सफ़र हो
है रात वो क्या रात कि जिस की न सहर हो
ठुकरा के चले जाना है बर-हक़ तुम्हें लेकिन
बस रखना ख़याल इतना जहाँ को न ख़बर हो
वो शब जो सितारों से भरी हो तो हमें क्या
पहलू में अगर तेरे मिरी शब न बसर हो
गरजा है बड़े ज़ोर से बादल ज़रा देखो
बिजली से गिरी जिस पे कहीं मेरा न घर हो
जीवन है सफ़र 'जोश' ये तस्लीम है लेकिन
महबूब का हो साथ तो क्या ख़ूब सफ़र हो