ख़ंजर चमका रात का सीना चाक हुआ
(कवि : ज़ेब ग़ौरी)
ख़ंजर चमका रात का सीना चाक हुआ
जंगल जंगल सन्नाटा सफ़्फ़ाक हुआ
ज़ख़्म लगा कर उस का भी कुछ हाथ खुला
मैं भी धोका खा कर कुछ चालाक हुआ
मेरी ही परछाईं दर ओ दीवार प है
सुब्ह हुई नैरंग तमाशा ख़ाक हुआ
कैसा दिल का चराग़ कहाँ का दिल का चराग़
तेज़ हवाओं में शो'ला ख़ाशाक हुआ
फूल की पत्ती पत्ती ख़ाक पे बिखरी है
रँग उड़ा उड़ते उड़ते अफ़्लाक हुआ
हर दम दिल की शाख़ लरज़ती रहती थी
ज़र्द हवा लहराई क़िस्सा पाक हुआ
अब उस की तलवार मिरी गर्दन होगी
कब का ख़ाली 'ज़ेब' मिरा फ़ितराक हुआ
जंगल जंगल सन्नाटा सफ़्फ़ाक हुआ
ज़ख़्म लगा कर उस का भी कुछ हाथ खुला
मैं भी धोका खा कर कुछ चालाक हुआ
मेरी ही परछाईं दर ओ दीवार प है
सुब्ह हुई नैरंग तमाशा ख़ाक हुआ
कैसा दिल का चराग़ कहाँ का दिल का चराग़
तेज़ हवाओं में शो'ला ख़ाशाक हुआ
फूल की पत्ती पत्ती ख़ाक पे बिखरी है
रँग उड़ा उड़ते उड़ते अफ़्लाक हुआ
हर दम दिल की शाख़ लरज़ती रहती थी
ज़र्द हवा लहराई क़िस्सा पाक हुआ
अब उस की तलवार मिरी गर्दन होगी
कब का ख़ाली 'ज़ेब' मिरा फ़ितराक हुआ
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सितारों से उलझता जा रहा हूँ सितारों से उलझता जा रहा हूँ
शब-ए-फ़ुर्क़त बहुत घबरा रहा हूँ
तिरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ
जहाँ को भी समझता जा रहा हूँ
यक़ीं ये है हक़ीक़त खुल रही है
गुमाँ ये है कि धोके खा रहा हूँ
अगर मुमकिन हो ले ले अपनी आहट
ख़बर दो हुस्न को मैं आ रहा हूँ
हदें हुस्न-ओ-मोहब्बत की मिला कर
क़यामत पर क़यामत ढा रहा हूँ
ख़बर है तुझ को ऐ ज़ब्त-ए-मोहब्बत
तिरे हाथों में लुटता जा रहा हूँ
असर भी ले रहा हूँ तेरी चुप का
तुझे क़ाइल भी करता जा रहा हूँ
भरम तेरे सितम का खुल चुका है
मैं तुझ से आज क्यूँ शरमा रहा हूँ
उन्हीं में राज़ हैं गुल-बारियों के
मैं जो चिंगारियाँ बरसा रहा हूँ
जो उन मा'सूम आँखों ने दिए थे
वो धोके आज तक मैं खा रहा हूँ
तिरे पहलू में क्यूँ होता है महसूस
कि तुझ से दूर होता जा रहा हूँ
हद-ए-जोर-ओ-करम से बढ़ चला हुस्न
निगाह-ए-यार को याद आ रहा हूँ
जो उलझी थी कभी आदम के हाथों
वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूँ
मोहब्बत अब मोहब्बत हो चली है
तुझे कुछ भूलता सा जा रहा हूँ
अजल भी जिन को सुन कर झूमती है
वो नग़्मे ज़िंदगी के गा रहा हूँ
ये सन्नाटा है मेरे पाँव की चाप
'फ़िराक़' अपनी कुछ आहट पा रहा हूँ
शब-ए-फ़ुर्क़त बहुत घबरा रहा हूँ
तिरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ
जहाँ को भी समझता जा रहा हूँ
यक़ीं ये है हक़ीक़त खुल रही है
गुमाँ ये है कि धोके खा रहा हूँ
अगर मुमकिन हो ले ले अपनी आहट
ख़बर दो हुस्न को मैं आ रहा हूँ
हदें हुस्न-ओ-मोहब्बत की मिला कर
क़यामत पर क़यामत ढा रहा हूँ
ख़बर है तुझ को ऐ ज़ब्त-ए-मोहब्बत
तिरे हाथों में लुटता जा रहा हूँ
असर भी ले रहा हूँ तेरी चुप का
तुझे क़ाइल भी करता जा रहा हूँ
भरम तेरे सितम का खुल चुका है
मैं तुझ से आज क्यूँ शरमा रहा हूँ
उन्हीं में राज़ हैं गुल-बारियों के
मैं जो चिंगारियाँ बरसा रहा हूँ
जो उन मा'सूम आँखों ने दिए थे
वो धोके आज तक मैं खा रहा हूँ
तिरे पहलू में क्यूँ होता है महसूस
कि तुझ से दूर होता जा रहा हूँ
हद-ए-जोर-ओ-करम से बढ़ चला हुस्न
निगाह-ए-यार को याद आ रहा हूँ
जो उलझी थी कभी आदम के हाथों
वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूँ
मोहब्बत अब मोहब्बत हो चली है
तुझे कुछ भूलता सा जा रहा हूँ
अजल भी जिन को सुन कर झूमती है
वो नग़्मे ज़िंदगी के गा रहा हूँ
ये सन्नाटा है मेरे पाँव की चाप
'फ़िराक़' अपनी कुछ आहट पा रहा हूँ
ख़ंजर चमका रात का सीना चाक हुआ ख़ंजर चमका रात का सीना चाक हुआ
जंगल जंगल सन्नाटा सफ़्फ़ाक हुआ
ज़ख़्म लगा कर उस का भी कुछ हाथ खुला
मैं भी धोका खा कर कुछ चालाक हुआ
मेरी ही परछाईं दर ओ दीवार प है
सुब्ह हुई नैरंग तमाशा ख़ाक हुआ
कैसा दिल का चराग़ कहाँ का दिल का चराग़
तेज़ हवाओं में शो'ला ख़ाशाक हुआ
फूल की पत्ती पत्ती ख़ाक पे बिखरी है
रँग उड़ा उड़ते उड़ते अफ़्लाक हुआ
हर दम दिल की शाख़ लरज़ती रहती थी
ज़र्द हवा लहराई क़िस्सा पाक हुआ
अब उस की तलवार मिरी गर्दन होगी
कब का ख़ाली 'ज़ेब' मिरा फ़ितराक हुआ
जंगल जंगल सन्नाटा सफ़्फ़ाक हुआ
ज़ख़्म लगा कर उस का भी कुछ हाथ खुला
मैं भी धोका खा कर कुछ चालाक हुआ
मेरी ही परछाईं दर ओ दीवार प है
सुब्ह हुई नैरंग तमाशा ख़ाक हुआ
कैसा दिल का चराग़ कहाँ का दिल का चराग़
तेज़ हवाओं में शो'ला ख़ाशाक हुआ
फूल की पत्ती पत्ती ख़ाक पे बिखरी है
रँग उड़ा उड़ते उड़ते अफ़्लाक हुआ
हर दम दिल की शाख़ लरज़ती रहती थी
ज़र्द हवा लहराई क़िस्सा पाक हुआ
अब उस की तलवार मिरी गर्दन होगी
कब का ख़ाली 'ज़ेब' मिरा फ़ितराक हुआ